Pithoragarh: पिथौरागढ़ की इस पहाड़ी पर है भगवान राम की माता का मंदिर, इन नियमों के साथ होते हैं दर्शन

रिपोर्ट- हिमांशु जोशी

पिथौरागढ़. उत्तराखंड में पिथौरागढ़ मुख्यालय से एक किलोमीटर दूर हुड़ेती गांव के सामने की ऊंची चोटी पर स्थित मां कौशल्या देवी मंदिर (Kaushalya Devi Temple Pithoragarh)है. यह पिथौरागढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. सड़क से पैदल 400 मीटर की चढ़ाई करते हुए घने जंगलों के बीच होते हुए मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है. मां कौशल्या देवी मंदिर में एक दिव्य गुफा है, जिसमें कौशल्या देवी भगवती के रूप में विराजमान हैं. यह मंदिर 24 घंटे खुला रहता है. जबकि विशेष अवसरों पर ही यहां पूजा-पाठ किया जाता है. इसके अलावा देवी के दर्शन से पूर्व लहसुन और प्याज खाना वर्जित है.

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीराम की माता कौशल्या ने अपनी कैलाश यात्रा के दौरान इस गुफा में विश्राम किया था और उन्हें इस स्थान पर दिव्य शक्तियों का अहसास हुआ था. उन्होंने तब यहां पर मां भगवती की स्थापना कर एक छोटे मंदिर का निर्माण कराया और तभी से इस स्थान को कौशल्या देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है. जबकि कौशल्या देवी हुड़ेती और कुजौली गांव की कुलदेवी हैं. यहां के ग्रामीण भगवती के रूप में इनकी पूजा करते हैं.

कुजौली के बुजुर्ग हेम उप्रेती ने कौशल्या मंदिर के बारे जानकारी देते हुए बताया कि कौशल्या देवी का आशीर्वाद उनके कुल पर हमेशा बना रहता है. स्थानीय ही नहीं पिथौरागढ़ आने वाले सैलानी भी इस मंदिर के दर्शन करने जाते हैं.

मां कौशल्या देवी मंदिर की गुफा है खास
मंदिर में 30 मीटर तक लंबी इस गुफा के अंदर कई प्रकार की पौराणिक मूर्तियां रखी गई हैं. अंदर बड़े पत्थर के रूप में मां कौशल्या की मूर्ति है, जो 1.5 मीटर की है. इसी प्रतिमा के पास एक शिवलिंग है. कहा जाता है कि भगवान राम ने खुद इस शिवलिंग की स्थापना कर कई दिनों तक यहां उपासना करने के बाद इस क्षेत्र के सभी राक्षसों का विनाश कर कैलाश मानसरोवर की ओर प्रस्थान किया था.

इस स्थान से पिथौरागढ़ शहर के मनोहर दृश्य के साथ ही पौण, हुड़ेती, पपदेव, खरकोट, चंडाक, बिण के साथ-साथ पंचाचूली हिमालय का भी विहंगम दृश्य दिखाई देता है. इस खूबसूरत नजारे को देखते ही शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है. मंदिर के प्रांगण में पहुंचते ही कौशल्या माता की कृपा से मन को असीम शांति का अहसास होने लगता है. देवी को चमत्कारी देवी भी कहा जाता है. इस मंदिर में किसी भी प्रकार की बलि नहीं दी जाती है. यहां फल-फूल व सादा प्रसाद ही माता को भोग में चढ़ाया जाता है.

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