लाल किला कवि सम्मेलन में लगे हंसी के ठहाके तो बही श्रृंगार और राष्ट्र प्रेम की बयार

Lal Qila Kavi Sammelan 2023: दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला कवि सम्मेलन भले ही लाल किले की प्राचीर में सम्पन्न नहीं हुआ हो, लेकिन हिंदी भवन में उठी राष्ट्र प्रेम की बुलंद आवाज की गूंज दूर-दूर तलक सुनाई पड़ी. हिंदी अकादमी दिल्ली के बैनर तले आयोजित यह कवि सम्मेलन कई मायनों में उल्लेखनीय साबित हुआ. 6 घंटे से भी अधिक चले इस सम्मेलन में पूरा भवन श्रोताओं से खचाखच भरा रहा. दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने खुद कई घंटे तक काव्य रस का रसास्वादन लिया. सरकार के कई आला अधिकारी तो पूरे सम्मेलन में उपस्थित रहे और कवियों की रचनाओं पर वाह-वाह करते देखे गए.

कवि सम्मेलन का उद्घाटन करने हुए उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि दिल्ली देश का दिल है और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र है. उन्होंने कहा कि भारत की भाषाएं समृद्ध होंगी तो राष्ट्रभाषा समृद्ध होगी. मनीष सिसोदिया ने कहा कि आजकल सोशल मीडिया पर जो गलत विचार, द्वेष और नफरस की बाढ़ आई हुई है उसे केवल कविताओं के माध्यम से साफ किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि कवि न केवल काव्य पाठ करके लोगों का दिल बहलाने का काम करता है बल्कि राष्ट्र के विकास और समाज को जोड़ने में कवि की रचनाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

कवि-सम्मेलन की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए अकादमी के सचिव संजय कुमार गर्ग ने कहा कि गणतन्त्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन गणतंत्र लागू होने के समय से ही चला आ रहा है. उन्होंने कहा कि किन्हीं कारणवश कवि सम्मेलन का आयोजन ऐतिहासिक लाल किला परिसर की अपेक्षा इस भवन में किया जा रहा है.

विश्व विख्यात हास्य कवि और व्यंग्यकार सुरेन्द्र शर्मा की अध्यक्षता और डॉ. प्रवीण शुक्ल के कुशल संचालन में काव्य पाठ का जो दौर शुरू हुआ, देर शाम तक श्रोताओं विभिन्न रसों का आनंद उठाया. सम्मेलन का शुभारंभ प्रसिद्ध कवयित्री कीर्ति काले द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ. इसके बाद हास्य कवि सुनहरी लाल ‘तुरंत’ ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘हमें ठंडे पानी से नहाना पड़ेगा’, पहले से ही ठंड में सिकुड़ रहे वातावरण में मानो शीत लहर चला दी. सुनहरी लाल तुरंत की इस रचना पर श्रोताओं ने खूह ठहाके लगाए.

ओज के कवि विनय विनम्र (Kavi Vinay Vinamra) ने राष्ट्र प्रेम से सरावोर रचनाएं प्रस्तुत करके माहौल को देशभक्तिमय कर दिया. उनकी यह रचना काफी पसंद की गई.

स्वाभिमानी बनें पूरा करके स्वप्न
खुशबुओं से महकने लगा है चमन
हिंदी का तंत्र ही मंत्र अपना बना
प्यारे गणतंत्र तुझको शत-शत नमन।।

मिल गए आप तो खिल गया तन-बदन
आज प्रमुदित धरा और प्रमुदित गगन
हर तरफ हो खुशी आज मन में लिए
है लुटता विनय भाव के कुछ सुमन।।

प्रसिद्ध लेखिका और कवि अलका सिन्हा (Poet Alka Sinha) ने विभिन्न रसों की रचनाएं प्रस्तुत कर वातावरण में विभिन्न काव्य रंग भरे-

पासपोर्ट के कागज पर लिखा हुआ नामभर नहीं है मेरा देश
जब चाहो एक मोहर लगाकार कर लो उसमें प्रवेश
देश होता है जिसके भीतर रहती हूं मैं
और मेरे भीतर रहता है देश

काव्य पाठ करतीं कवि अलका सिन्हा.

अलका सिन्हा की कविता ‘झारखंड की एक लड़की’ ने माहौल को नम कर दिया. उनकी ‘रचना गुमनाम आदमी का देश प्रेम’ ने भी खूब तालियां बटोरीं.

इटावा से आए राजीव राज ने अपने मधुर कण्ठ से गीतों की गंगा जो बहाई, सभी लोग उसमें गोते लगाने लगे-

धूप बनकर फैल जाओ, चांदनी बनकर जीओ
गुप अंधेरा छा न जाए, रोशनी बनकर जीओ
आदमी के रूप में पैदा हुए तो क्या हुए
बात तो तब है कि सचमुच आदमी बन कर जीओ।

राजीव राज (Dr Rajeev Raj) ने समाज में भाईचारे का संदेश का कुछ इस तरह दिया-

आदमी की आंख में घटती कमी पर सोचिए
आदमी में घटती आदमियत पर सोचिए
आदमी ही जल गया गर मजहबी बारूद में
कौन सा मजहब बचेगा इस जमीं पर सोचिए।

राजीव राज के प्रेम भरे गीत “अक्षर-अक्षर छंदों में” पर लोग झूमने पर मजबूर हो गए.

फरीदाबाद से आए हास्य कवि दीपक गुप्ता (Kavi Deepak Gupta) ने कई रसों की छटा बिखरकर माहौल को कभी गंभीर किया तो कभी खूब गुदगुदाया-

जिंदगी के रास्ते दुश्वार हैं,
उस पर भी हम साहिब-ए-किरदार हैं
हमको जुमलों की तरह से मत पढ़ो
हम अदब की प्रेस के अखबार हैं।।

ना जाने आजकल हम किस तरह के मद में रहते हैं
हमारी सोच छोटी है यूं आदम कद में रहते हैं
किसी का भी बुरा करने से पहले ये समझ लें बस
कि हम हर पल खुदा के कैमरे की जद में रहते हैं।।

करम है दोस्तों का ये कि मैं मझदार में तो हूं
मगर मैं हूं जहां अपने असल किरदार में तो हूं
भले ही मेरे खरीदारों की गिनती कम सही दीपक
मुझे इतनी तसल्ली है कि मैं बाजार में तो हूं।।

दीपक गुप्ता ने सनसनी परसोतने टीवी चैनलों पर भी खूब कटाक्ष किया-

हर चैनल का दावा है ये खबर सनसनीखेज मिलेगी
इसरो-विसरो, नासा-वासा से भी आगे तेज मिलेगी
हिंसा, दंगे, मिर्च-मसाले इन सबसे लवरेज मिलेगी
कर्म करोगे तो फल पाओगे, कांड करो कवरेज मिलेगी।।

दीपक गुप्ता की कविता ‘क्या कहा मर गया वो’ ने पूरे वातावरण को स्तब्ध कर दिया.

शब्द, स्वर और भाव की सरगम लेकर आईं डॉ. मालविका हरिओम (Malvika Hariom) ने अपने गीत से सभी को भावभिभोर कर दिया-

दुनिया से याराना चलता रहता है
दिल में एक वीराना पलता रहता है
प्यार-मोहब्बत के मसलों को जीवनभर
नफरत से सुलझाना चलता रहता है
उसके हाथ में मेरी भाग्य लकीरें थीं
उसका हाथ छुड़ाना खलता रहता है
एक दिन प्यार की कंदीलें बुझ जाती हैं
पर दिल का परवाना जलता रहता है।

हरियाणा से आए मस्ती के कवि महेंद्र शर्मा (Hasya Kavi Mahendra Sharma) ने अपनी हास्य रचनाओं से श्रोताओं को खूब हंसाया-
जान कहकर जान ले गई वो,
घर का सारा सामना ले गई वो
हम चल दिए आंख बंदकर उसके पीछे
जन्नत के बहाने श्मसान ले गई वो।

महेंद्र शर्मा ने विपरीत समय में भी सहज रहने का नुस्खा कुछ इस तरह बताया-

गम को गाकर के देखो मजा आएगा
मुस्कुराकर के देखो कि मजा आएगा
तन झुका लो इसमें गलत कुछ नहीं
मन झुकाकर के देखो मजा आएगा।

शायर आलोक यादव (Shayar Alok Yadav) ने श्रोताओं को गज़ल के गुलशन की सैर कराई.

इक ज़रा सी चाह में जिस रोज़ बिक जाता हूं मैं
आइने के सामने उस दिन नहीं आता हूं मैं
रंज ग़म उस से छुपाता हूं मैं अपने लाख पर
पढ़ ही लेता है वो चेहरा फिर भी झुटलाता हूं मैं

आईएएस अधिकार आलोक यादव ने अपने इस शेर पर खूब दाद बटोरी-

अब ना रावण की कृपा का भार ढोना चाहता हूं
आ भी जाओ राम मैं मारीच होना चाहता हूं।

शहनाज हिन्दुस्तानी ने ओज से भरी कविता पर माहौल में एकदम जोश भर दिया-
मैंने पोंछा है सिंदूर धरती की लाज हित
मेरा पुत्र भी बहाने रक्त रण जाएगा।

डॉ. कीर्ति काले प्रेम और देशप्रेम पर समर्पण कविता पर खूब तालियां बटोरीं-

याद कोई करता है हिचकियां बताती हैं
कौन पास कितना है दूरियां बताती हैं
धीरे-धीरे खुलते हैं ये दिलों की दरवाजे
दिल की बात आंखों की खिड़कियां बताती हैं
भाई की भुजाओं के शौर्य पर भरोसा है
सरहदों पर बहनों की राखियां बताती हैं।

कार्यक्रम का शानदार संचालन कर रहे प्रसिद्ध कवि प्रवीण शुक्ल (Dr Praveen Shukla) ने संचालन के दौरान अलग-अलग विधा के कवियों को उनकी रचनाओं के माध्यम से याद किया. अपने काव्य पाठ में उन्होंने ओज, हास्य और श्रृंगार रस से सरावोर कविताओं का पाठ किया. राष्ट्र को समर्पित उन्होंने पंक्तियां प्रस्तुत कीं-

आन, मान, सम्मान मिटे, एक एक अरमान मिटे
जिस भूमि पर जन्म लिया है उस पर ही ये जान मिटे।

शब्दों का सिंहावलोकन छंद प्रस्तुत करके प्रवीण शुक्ल ने लोगों को स्तब्ध कर दिया-

रोटी, चाहे पतली-सी होवे, होवे चाहे मोटी
मोटी को भी खाता है भूखा-थका आदमी
आदमी में आती-जाती दिन रात ही कमी
कमी है कि और और और और होवे पैसा
पैसे से ले लूं एक वायुयान जैसा
वायुयान जैसे में रात-दिन घूमूं
घूमूं होटलों में और बोतलों को चूमूं
चूमूं झूमूं नाचूं गाऊं ताता-ताता थैया
थैया के लिए कुछ और हो रूपैया
रुपैए के धरे हो बक्से से गरम से
बक्से से गरम से हैं बिगड़े करम से
बिगड़े करम से ही चूम लूं मैं चोटी
चोटी पर भी खोएगा वही चार रोटी।

मंचों पर गीतों के शहजादे कहे जाने वाले डॉ. विष्णु सक्सेना ने अपने सुरीले गीतों से सभी को झूमने पर मजबूर कर दिया. विष्णु सक्सेना (Dr Vishnu Saxena) ने प्रेम से पगे गीत प्रस्तुत किए-

जो हाथ थाम लो वो फिर न छूटने पाए
प्यार की दौलतें कोई ना लूटने पाए
जब भी छूलो बुलंदियां तो ध्यान ये रखना
जमीं से पांव का रिश्ता न टूटने पाए।

विष्णु सक्सेना ने कहा कि जिसके पास प्यार की दौलत होती वह कभी गरीब नहीं हो सकता-

प्यास बुझ जाए तो शबनम खरीद सकता हूं
जख्म मिट जाएं तो महरम खरीद सकता हूं
ये मानता हूं मैं दौलत नहीं कमा पाया
मगर तुम्हारा हर एक गम खरीद सकता हूं।

वरिष्ठ शायर मंगल नसीम ने प्यार, सद्भभावना और समर्पण से भरे शेर प्रस्तुत किए-

बर्वाद यूं दीवारो-दर अपने नहीं होते
कुछ लोग लुटेरों में गर अपने नहीं होते।
ये जिंदगी जीते हैं हम उनके लिए जिनको
हम अपना समझते हैं पर अपने नहीं होता।
महदूद उड़ानों में उड़ लेना उतर आना
पाले हुए पंक्षी के पर अपने नहीं होते।
घर अपने कई होंगे कोठों की तरह लेकिन
कोठों के मुकद्दर में घर अपने नहीं होते।
आती है सदा अक्सर सरहद की चट्टानों से
जाबांज लड़ाकों के सर अपने नहीं होते।

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे हास्य और व्यंग्य के स्तंभ कहे जाने वाले प्रसिद्ध कवि सुरेंद्र शर्मा ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राजनीति पर कटाक्ष किया. उन्होंने घमंड न करने की सलाह देते हुए कहा-

सूर्य तुम बड़े महान हो,
तुम्हारी महानता को मैं मानता हूं
तुम्हारी ताकत को मैं स्वीकारता हूं
क्योंकि तुम सुखा देते हो
नदियां, नाले, पोखर, झरने, तालाब
पर मुझे तुम्हारी कमजोरी पर
बड़ा तरस आता है
जब तुम नहीं सुखा पाते
किसी मजदूर के पसीने की बूंदें।

कवि-सम्मेलन के अंत में हिंदी अकादमी के उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि हम सब यहां 74वें गणतंत्र दिवस का महोत्सव मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं. और यह केवल एक पर्व ही नहीं सभी देशवासियों का गौरव है. उन्होंने कहा कि कविता समाज की भाषा और भावना दोनों ही होती है साथ ही, यह हिंदी भाषा का पोषण भी करती है.

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