बिहार का आत्मनिर्भर गांव: कसेरा टोला का हर हाथ हुनरमंद, पीतल के बर्तनों की दिल्‍ली समेत कई जगह डिमांड

रिपोर्ट: अशीष कुमार

पश्चिम चम्पारण. बिहार के पश्चिम चंपारण का नाम जेहन में आते ही कई ऐतिहासिक घटनाएं आंखों के सामने तैरने लगती है. चंपारण कई मायनों में खास इसलिए है कि वह अपनी पुरानी विरासत को संजोने में काफी हद तक कामयाब रहा है. आज के आधुनिक दौर में भी औजार बनाने की पुरानी पद्धति चंपारण में कायम है. आपको चंपारण के एक ऐसे ही गांव कसेरा टोला से रूबरू कराते हैं, जहां कई पीढ़ियों से लोग धातु के बर्तन बनाने के कार्य में जुटे हुए हैं.

दरअसल बिहार के पश्चिम चंपारण के मझौलिया प्रखंड स्थित कसेरा टोला हाथ से धातु के बर्तन तैयार करने के लिए जाना जाता है. इस गांव की आबादी 1500 के आसपास है, जहां तकरीबन 150 घरों में पुरानी पीतल को आकर्षक तरीके से नक्काशी कर बर्तन बनाए जाते हैं. खास बात यह है कि यहां के कारीगर बहुत सीमित औजार की मदद से बर्तन तैयार कर देते हैं. बर्तन की सप्लाई बिहार सहित दिल्ली, यूपी, बंगाल और झारखंड तक की जाती है.

आपके शहर से (पश्चिमी चंपारण)

पश्चिमी चंपारण

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पीढ़ी दर पीढ़ी बर्तन बनाने की चली आ रही है परंपरा
कसेरा टोला गांव निवासी अशोक साह ने बताया कि उनके यहां बर्तन बनाने की परंपरा पुश्तों से चली आ रही है. गांव के सचिव राजन कुमार ने बताया कि पूरे गांव में यह काम पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. सबसे बड़ी बात यह है कि बिना किसी आधुनिक मशीन का सहयोग लिए बिना चंद पारंपरिक औजारों की मदद से ही बड़ी ही खूबसूरती के साथ लगभग 5 से 10 प्रकार के बर्तनों को बनाया जाता है. इसमें थाली, घंटी, झाल और कलछुल के अलावा कई अन्‍य चीजें शामिल हैं.

एक हजार किलो पीतल का रोजाना होता है खपत
राजन ने बताया कि गांव में रोजाना तकरीबन एक हजार किलो तक पीतल के बर्तन तैयार किए जाते हैं. एक थाली का वजन लगभग 1 किलोग्राम तक होता है. ऐसी 150 से 200 थालियां एक दिन में तैयार की जाती है. ठीक उसी प्रकार लगभग 3 से 4 किलो वजनी 100 से 120 घंटियां तथा 500 ग्राम वजनी लगभग 150 से 200 कलछूल कुशल कारीगर हाथों से तैयार करते हैं. इनको पूरे बिहार समेत दिल्ली, बंगाल, झारखंड और यूपी में सप्लाई किया जाता है.

वजन के आधार पर मिलती है मजदूरी
पीतल के बर्तन बनाने के कार्य में जुटे संदीप बताते हैं कि कई घंटों की मेहनत के बाद जब वो बाजार में इसे दुकानों पर बेचने जाते हैं, तब उन्हें बर्तन की वजन के आधार पर ही मजदूरी मिलता है. दरअसल गांव के लोग शहर के दुकानदारों से पुरानी पीतल लाते हैं, जिसके एवज में उन्हें दुकानदार को उतनी ही वजन का बनाया हुआ बर्तन देना होता है. इसके अलावा दुकानदार उन्हें 80 रुपए प्रति किलो के हिसाब से वजन के बराबर मजदूरी देते हैं. अगर एक थाली का वजन 1 किलोग्राम है, तो दुकानदार उस पर सिर्फ 100 रुपए देगा. सबसे बड़ी बात यह है कि पीतल की कीमत के हिसाब से मजदूरी में उतार-चढ़ाव होता रहता है.

बेतिया राज ने कसेरा जाति के लोगों को दी थी पनाह
राजन ने न्यूज़ 18 लोकल को बताया कि कसेरा गांव में बसने वाले लोग नेपाल और अन्य दूसरे राज्यों से आए हैं जिन्हें पहले बेतिया राज के द्वारा बिहार में बसाया गया. इसके साथ उनकी कारीगरी को एक नई दिशा दी गई, तब से वे बिहार के हीं होकर रह गए. बेतिया राज द्वारा बसाए गए कसेरा जाति के कुशल कारीगरों को अब बिहार सरकार कई सुविधाएं दे रही है जिसमें उनसे किसी प्रकार का कर नहीं वसूला जाता है. साथ ही उन्हें अपने रोजगार को नई दिशा देने के लिए सरकार की तरफ से लगभग 5.50 करोड़ रुपए का अनुदान मिला है. इस राशि की मदद से अब गांव में सभी कारीगरों के लिए एक भवन निर्माण कर भट्टी और रोलिंग मशीनों को लगाया गया है.

Tags: Bihar News, Champaran news

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