धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के लाभ पर सवाल, खुल सकता है विवादों का पिटारा | – News in Hindi

आर्यन खान मामले में जांच अधिकारी समीर वानखेड़े के खिलाफ तत्कालीन मंत्री नवाब मलिक ने फर्जी दस्तावेज से नौकरी लेने के आरोप लगाए थे. आरोपों के अनुसार इस्लाम धर्म स्वीकार करने की वजह से वानखेड़े को दलित आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता था. दलित महिला अंतर्जातीय विवाह कर ले तो उसके बच्चों को आरक्षण के लाभ देने पर विवाद हैं. तो फिर धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के लाभ के सवाल पर संवैधानिक चुनौतियों के साथ विवादों का पिटारा भी खुल सकता है. आयोग के गठन के बाद मतांतरित दलितों को आरक्षण पर नया विवाद शुरू हो गया है. इसके संवैधानिक और कानूनी पहलुओं को इन 6 प्वाइंट्स में समझने की जरुरत है.

1. धर्म के आधार पर आरक्षण विभेदकारी

राष्ट्रपति के आदेश के जरिए ही किसी जाति को अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल किया जाता है. जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता को हिन्दू धर्म की कुरीति माना जाता है. इसलिए संविधान (एससी) आदेश 1950 के अनुसार सिर्फ हिन्दू धर्म में शामिल लोगों को ही एससी यानि दलित आरक्षण का लाभ मिलता है. पहला पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन 1955 में हुआ था, जिसे केलकर समिति कहते हैं. उसकी रिपोर्ट के अनुसार सन् 1956 में सिखों को इसके दायरे में शामिल कर लिया गया.

1983 की एचपीपी रिपोर्ट के अनुसार 1990 में बौद्ध धर्म के लोगों को भी एससी के दायरे में शामिल कर लिया गया. अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जनजाति में धर्म के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है. इसलिए पिछले दो दशकों से मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोगों को दलित आरक्षण के दायरे में लाने की मांग हो रही है. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के अनुसार धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव असंवैधानिक है. समर्थकों के अनुसार धर्म परिवर्तन के बावजूद दलितों का पिछड़ापन खत्म नहीं हुआ इसलिए उन्हें भी आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए.

2. मुस्लिम और ईसाई धर्म के दलितों से क्रीमीलेयर का खतरा

भाजपा और सरकार का यह मानना है कि मुस्लिम और ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती इसलिए उन्हें एससी के दायरे में लाना ठीक नहीं है. मुस्लिम और ईसाई धर्म में शामिल होने के बाद दलितों को आरक्षण का लाभ मिला तो हिन्दू धर्म के अस्पृश्य लोगों को नुकसान होगा. अन्य धर्म के लोगों के क्रीमीलेयर के लोग वास्तविक दलितों के हक़ में सेंधमारी कर सकते हैं. भारत के कई राज्यों में धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बन रहे हैं लेकिन इस आरक्षण से धर्म परिवर्तन को बढ़ावा मिलेगा.

3. सुप्रीम कोर्ट में कई सालों से हो रही सुनवाई

इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के नौ जजों के फैसले के अनुसार कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता है. केंद्र सरकार में एससी को 15 फीसदी, एसटी को 7.5 फीसदी और ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है. आरक्षण की अधिकतम सीमा में 50 फीसदी के प्रतिबंध की वजह से अदालतों में अनेक कानूनी विवाद चल रहे हैं. दलित मुस्लिम और ईसाईयों को आरक्षण के दायरे में लाने सुप्रीम कोर्ट में कई सालों से मामले लम्बित हैं. अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में सरकार से जवाब मांगा था, जिस पर अगली सुनवाई 11 अक्टूबर को होनी है. उसके पहले सरकार ने इस मामले के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन के लिए आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की है. आरक्षण समर्थकों के अनुसार आयोग की रिपोर्ट अगले आम चुनाव के बाद ही आयेगी, जिसकी वजह से फैसले में विलंब होगा.

4. दलित आरक्षण के बारे में पूर्ववर्ती आयोग

केंद्र सरकार ने नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि पुरानी समितियों और आयोगों की रिपोर्ट के आधार पर मतांतरित दलितों के आरक्षण के बारे में फैसला नहीं किया जा सकता. इस बारे में पिछड़े वर्ग आयोगों ने अनेक रिपोर्ट दी हैं. उसके अलावा अनुसूचित जाति के शैक्षणिक और आर्थिक विकास के पहलुओं पर सन् 1969 में एक रिपोर्ट आई थी. अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यकों के लिए 1983 में एक समिति बनी थी. सन् 2004 में पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय, धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ था. इस आयोग ने मतांतरित हुए दलितों के आरक्षण के बारे में भी विचार किया था.

मई 2007 में दी गई रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने धर्म की बजाए सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देने की सिफारिश की थी. आयोग की सदस्य सचिव आशा दास ने मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोगों को दलित आरक्षण के दायरे में लाने का विरोध किया था. समर्थकों के अनुसार बौद्ध और सिख धर्म के लोगों को दलित आरक्षण के दायरे में लाने के लिए जांच आयोग के तहत आयोग का गठन नहीं हुआ था. लेकिन राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विजय साम्पला के अनुसार विस्तृत अध्ययन के बगैर इस जटिल मामले में फैसला लेना ठीक नहीं होगा.

5. आरक्षण के कई पहलुओं पर अदालतों में विवाद

73वें और 74वें संविधान संशोधन के अनुसार पंचायती राज प्रणाली आई. उसमें आरक्षण के लिए संविधान पीठ ने सन् 2010 में ट्रिपल टेस्ट थ्योरी दी थी. ईबीसी आरक्षण पर अदालत के आदेश का अनुपालन नहीं करने पर बिहार में नगरपालिका और नगरनिगमों के चुनावों में हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है. इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकती है. आर्थिक कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को 10 फीसदी आरक्षण के बारे में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने मामला लंबित है. कर्नाटक सरकार ने चुनावों के पहले एससी और एसटी के कोटे को दो फीसदी और चार फीसदी बढ़ाकर कुल आरक्षण को 56 फीसदी कर दिया है. शिक्षण संस्थाओं, विधानसभा, लोकसभा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के बाद अब न्यायपालिका में भी आरक्षण की मांग होने लगी है. प्रमोशन, निजी क्षेत्र और राज्यों में माटीपुत्रों के लिए आरक्षण पर भी कई तरह के विवाद हैं.

6. जस्टिस बालाकृष्णन आयोग का गठन

जांच आयोग अधिनियम 1952 की धारा 3 के तहत केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को तीन सदस्यीय आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन आयोग के अध्यक्ष हैं. पूर्व आईएएस रवींद्र कुमार जैन और यूजीसी की सदस्य प्रो. सुषमा यादव अन्य दो सदस्य हैं. जस्टिस बालाकृष्णन आयोग अध्ययन करेगा कि संविधान के अनुच्छेद-341 में उल्लेखित हिन्दू, बौद्ध या सिख धर्म के अलावा मतांतरित मुस्लिम या ईसाई धर्म के लोगों को क्या अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है.

आयोग यह भी जांच करेगा कि धर्मांतरण के बाद रीति-रिवाज, परंपरा एवं सामाजिक दर्जे में मतांतरित दलितों के आर्थिक और सामाजिक दर्जे में क्या बदलाव हुए? आयोग को दो साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है. आरक्षण के कई मोर्चों पर जंग के बीच बिहार में जातिगत जनगणना का काम भी मुस्तैदी से चल रहा है. सरकारी नौकरियों में कमी के बीच निजी शिक्षण संस्थानों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है. लेकिन चुनावी लाभ के लिए अदालतों में आरक्षण के अनेक मुद्दों पर जंग जारी है.

ब्लॉगर के बारे में

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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