दास्तान-गो : जेपी दत्ता, जो ‘बॉर्डर’ से जंग के हालात सीधे फिल्मी पर्दे पर ले आए

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

———–

जनाब, कहा तो यूं जाता है कि हिन्दी फिल्मों की दुनिया के मशहूर फिल्मकार ज्योति प्रकाश दत्ता यानी जेपी दत्ता साहब देशभक्ति पर आधारित फिल्में ही अव्वल तौर पर बनाया करते हैं. और कहने वालों ने शायद यह बात इसलिए कही क्योंकि दत्ता साहब ने अब तक यही कोई 40 सालों की अपनी फिल्मों की ज़िंदगी में ज़्यादातर इसी तरह की फिल्में बनाई भी. अब तक उन्होंने बस 11 फिल्में बनाई हैं. इनमें से 6-7 सात या शायद उससे भी ज़्यादा देशभक्ति से जुड़ी हैं. फिर वह चाहे साल 1997 की ‘बॉर्डर’ हो, जिसे रिलीज़ होने के एक साल बाद ही यानी 1998 में ‘राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय अवॉर्ड’ मिला. या साल 2003 की ‘एलओसी कारगिल’. या फिर 2018 की ‘पलटन’. या उनकी सबसे पहली फिल्म ही साल 1976 की ‘सरहद’, जिसे आज तक रिलीज़ ही नहीं किया जा सका. कोई भी हों, सब देश और देशभक्ति की बात करती हैं.

हालांकि, इसके बावजूद सवाल हो सकता है कि दत्ता साहब के लिए सिर्फ ये कह देना ठीक होगा क्या कि वे ज़्यादातर ‘देशभक्ति आधारित फिल्में बनाते हैं?’ शायद इस सवाल का ज़वाब बहुत लोगों के ज़ेहन में ‘नहीं’ के तौर पर ही उभरेगा क्योंकि बात सिर्फ़ इतनी नहीं है. यह ठीक है अलबत्ता कि उनकी फिल्मों में देशभक्ति सबसे अहम है. फिर भी सोचिए कि हिन्दी सिनेमा में ऐसी कितनी फिल्में हैं, जिन्होंने ‘बॉर्डर’ पर जंग के हालात सीधे फिल्मी पर्दे पर यूं ज़िंदा किए हों कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएं? तोप से छूटते गोलों के धमाकों और बरसतीं गोलियों की आवाज़ों के बीच जिनमें ‘बॉर्डर’ से, मोर्चे से, फ़ौजियों के जज़्बातों की आवाज़ सुनाई दी हो? जिसे सुनकर देखने-सुनने वालों की आंखें नम हो जाया करें? यक़ीन मानिए, इन सवालों के ज़वाब तलाशने के लिए ज़ेहन पर जितनी बार भी जोर डालेंगे, वहां दत्ता साहब की ही किसी फिल्म की तस्वीर उभरेगी.

इसीलिए ये कहना शायद ज़्यादा मुफ़ीद (सार्थक) होगा कि दत्ता साहब वे पहले फिल्मकार हैं, जिन्होंने ‘बॉर्डर’ पर जंग के हालात सीधे फिल्मी पर्दे पर उतारे. पुरअसर तरीके से. वह भी गोली-बारी के साथ-साथ ही फ़ौजियों के जज़्बात, उनकी प्रेम कहानियों के किस्से कहते हुए. ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं, ‘बॉर्डर’ फिल्म का नाम बस सोच लीजिए एक बार. हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच 1971 की लड़ाई का पूरा मंज़र याद आ गया न? साथ ही कानों में कुछ नग़्मे गूंजने लगे होंगे. जैसे- ‘संदेशे आते हैं, हमें तड़पाते हैं’ या ‘ऐ जाते हुए लम्हों ज़रा ठहरो, ज़रा ठहरो’. ये तमाम नग़्मे घर-बार, रिश्ते-नातों के लिए फ़ौजियों के दिली जज़्बात उभारकर सामने लाते हैं. तो वहीं, इसी फिल्म का एक बड़ा रूमानी सा नग़्मा ‘हमें जब से मोहब्बत हो गई है’. इसका फिल्मी मंज़र देखकर तो शायद ही कोई कहे सके यह किसी युद्ध-आधारित फिल्म का गाना है.

ऐसे ही मुख़्तलिफ़ हालात बयां करती ‘एलओसी कारगिल’, जिसने 1999 की कारगिल की लड़ाई को देखने वालों की आंखों के सामने यूं ला खड़ा किया कि कोई लफ़्ज़ों में कैसे ही बयां करे उन्हें. सरहद पर मुल्क के लिए फ़ौजियों की बहादुरी और एक-दूसरे के लिए भी उनका ख़ुद को दांव पर लगाना. शहीद फ़ौजियों के घर आते ताबूत, उनकी विधवाओं, उनकी मा’शूक़ाओं, उनके घरवालों के जज़्बात. क्या कुछ नहीं था उसमें, जो कई मर्तबा फिल्मी पर्दे पर टकटकी लगाए बैठे लोगों को कभी रुला जाता था तो कभी हिन्दुस्तान के ‘पड़ोस में ठहरे दुश्मन’ के लिए गुस्से से भर देता था. इसी तरह, ‘पलटन’ फिल्म. हिन्दुस्तान और चीन के बीच सरहद पर जिस तरह के हालात पेश आते हैं, उन्हें ऐसे असरदार तरीके से शायद ही पहले कभी किसी फिल्म ने दिखाया हो. इनके साथ ‘रिफ़्यूजी’ (साल 2000), जो हिन्दुस्तान के बंटवारे में दो तरफ़ बंट गए शरणार्थियों के हालात कहती है.

अलबत्ता मोहब्बत की कहानियां इन शरणार्थियों के बीच भी कैसे पनपती हैं और किस तरह दुनिया को संदेश देती हैं कि ‘पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके’. और फिर सोचने पर भी मज़बूर करती हैं कि ‘सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इन्सां हो के’, यह भी दत्ता साहब की अलहदा कारसाज़ी (कौशल) में मुमकिन होता है. हालांकि, दत्ता साहब के फिल्मी शाहकार का दायरा सिर्फ़ इसी तरह की फिल्मों पर नहीं ठहरता. उसके मुख़्तलिफ़ रंगों को देखना चाहें तो ‘उमराव जान’ है. जब यह पिक्चर आई तो लोगों के दिमाग़ में तमाम तरह की शंकाएं थीं. क्योंकि इसी नाम से 1981 में एक फिल्म बनी थी, जिसमें फारूक़ शेख, नसीरुद्दीन शाह, रेखा जैसे फ़नकारों ने ऐसी अदकारी दिखाई थी कि उसके आस-पास भी कोई ठहर सकेगा, इस पर शुब्हा होता था. पर दत्ता साहब की अगुवाई में ऐसे तमाम शक-ओ-शुब्हा किनारे धरे रह गए और फिल्म चल निकली.

JP Dutta

उनकी कुछ पुरानी फिल्मों का भी इस सिलसिले में ज़िक्र लाज़िम है. जैसे- ‘ग़ुलामी’ (1985), जो कि हिन्दुस्तानी समाज में एक वक्त तक फैली रही दास-प्रथा की कहानी कहती है. वो मशहूर गाना भी इसी में है ‘ज़े-हाल मिस्किन मकुन ब-रंज़िश, बहाल-ए हिज्रा बेचारा दिल है. सुनाई देती है जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है’. यह दत्ता साहब की पहली फिल्म कही जाती है, जिनके शाहकारों (कला संबंधी बड़ी कृति) के दायरे को खंगालिए तो उसमें ऐसे कई नगीने और मिलेंगे. अलबत्ता इसमें एक नगीना जड़ते जड़ते रह गया. वही, जिसका शुरू में जि़क्र किया, ‘सरहद’. वह फिल्म दत्ता साहब की पहली फिल्म होती, अगर रिलीज़ हो जाती. जंग के दौरान क़ैद किए जाने वाले क़ैदियों की कहानी कहने वाली इस फिल्म के रिलीज़ होने से पहले से ही इसके प्रोड्यूसर ने इसमें और रकम लगाने से मना कर दिया. इसलिए इसकी कहानी अधूरी ही रह गई फिर.

हालांकि, दत्ता साहब के मंसूबे अधूरे नहीं रहे. ‘सरहद’ वाले वाक़ि’अे के ठीक नौ साल बाद ‘ग़ुलामी’ से उनके मंसूबों के पूरे होने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसमें न कभी पैसे का मामला आड़े आया और न ही इरादे का. लिहाज़ा, एक के बाद एक मील के पत्थर रखते गए वे फिर आगे के अपने सफर के दौरान. दत्ता साहब, आज जिनका जन्मदिन (3 अक्टूबर 1949 को बंबई में ही पैदाइश) है, अक्सर कहा करते हैं, ‘हम अपने इतिहास से भागते क्यों हैं? समझ नहीं आता. ‘बॉर्डर’ से पहले हिन्दुस्तान की लड़ाइयों पर जितनी भी फिल्में बनीं, उनमें किसी में भी पड़ोसी मुल्क का नाम क्यों नहीं लिया गया? उन्हें या तो ‘दुश्मन’ कहा गया या ‘पड़ोसी’. पाकिस्तान को पाकिस्तान को क्यों नहीं कहा गया? इसका ज़वाब मुझे यही मिला कि शायद फिल्मी दुनिया में फ़ौज के बारे में ज़्यादा समझ नहीं रही. इस रवैये से मुझे कोफ़्त होती रही. इसीलिए जब मुझे मौका मिला मैंने अपने तईं ये ख़ामी दूर करने की कोशिश की’. और ये कोशिश यक़ीनन कामयाब रही जनाब. तभी क़ाबिल-ए-ज़िक्र हुई है.

Tags: Birth anniversary, Border, Hindi news, News18 Hindi Originals

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *