दास्तान-गो : अशोक कुमार, किशोर कुमार की ‘चलती का नाम गाड़ी’, पर चली कैसे ये?

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, सोचकर देखिए, उन चुनिंदा ख़ास-ओ-आम के बारे में, जिनके साथ कभी ऐसा हादसा हुआ हो कि उनका अपना कोई नज़दीकी उन्हीं के जन्मदिन के रोज गुज़र जाए. दुनिया छोड़ जाए. और उस पर भी ‘अपना’ अगर ऐसा हो, जिसे ख़ुद बच्चे की तरह बड़ा किया हो तो? मुश्किल होती होगी न? बहुत मुश्किल होती होगी यक़ीनन, बाकी ज़िंदगी में. ऐसी मुश्किल का जो सामना करता है, वही बता सकता है, इसका पैमाना. अपने दौर में हिन्दी फिल्मों की दुनिया के बड़े सितारे रहे अशोक कुमार (दादा मुनि), आज अगर होते तो वे बता पाते शायद. क्योंकि दादा मुनि ऐसे लोगों में शुमार रहे हैं. आज, यानी 13 अक्टूबर को पड़ने वाले उनके जन्मदिन पर यह दाग़ भी है कि इसी रोज उनका अज़ीज़ छोटा भाई किशोर ये दुनिया छोड़कर चला गया. वह भाई, जिसे उन्होंने अंगुली पकड़कर चलना सिखाया. वह भाई, जिसका हाथ उन्होंने तब तक थामे रखा, जब तक दुनिया में पैर मज़बूती से जम नहीं गए उसके.

एक इंटरव्यू के दौरान याद किया था ‘दादा मुनि’ ने, ‘उसकी (किशोर कुमार) ख़ासियत क्या थी? वह जब सुर पे बैठता था, तो तीर जैसा बैठता था. एकदम पिनप्वाइंटेड. बाकी जितने गाने वाले हैं, थोड़ा क्या करते हैं कि कमसुरा हो जाते हैं. मैं बताऊं आपको हर सुर में तीन सुर (रेंज के लिहाज़ से ऊपर, नीचे, बीच में) होते हैं. लेकिन वह कहीं भी बेसुरा या कमसुरा होता ही नहीं था. इसीलिए वह बहुत सफ़ल हो गया गाने में. मगर क्या करें ज़ल्दी चला गया’. ऐसा ज़िक्र करते हुए ‘दादा मुनि’ की गर्दन झुक जाती है. चेहरे पर उभर आया दर्द छिपा ले जाते हैं वे. हालांकि उस हादसे की सिलवट उनकी ज़िंदगी पर यूं पड़ी कि जाहिर होती ही रही अक्सर. उन्होंने ख़ुद तो नहीं बताया वैसे, पर दुनिया जानती है कि ‘दादा मुनि’ ने ज़िंदगी के आख़िरी 14 साल (10 दिसंबर 2001 को दुनिया छोड़ने तक) में अपना जन्मदिन फिर कभी मनाया नहीं. मना नहीं सकते थे. वे तो क्या, कोई आम इंसान भी नहीं मना सकता था.

हालांकि, जब किशोर इस दुनिया में रहे तब ‘दादा मुनि’ की ज़िंदगी में इस तरह का कोई अफ़सोस शायद ही कभी रहा हो. उस वक़्त तो इन भाईयों की ज़िंदगी में मौज़-मस्ती, हंसना-हंसाना ही होता था अक्सर. ख़ुद ‘दादा मुनि’ की ज़ुबानी ‘हम तीनों भाई (अनूप कुमार भी) सहज कॉमेडी करते रहे. क्योंकि वह दरअस्ल, हमारे पिता जी (कुंजलाल गांगुली) की देन है. यानी हमें विरासत में मिली है. पिता जी हमारे, वैसे तो वकील थे. लेकिन उनकी हर बात में कॉमेडी होती थी. वे कोर्ट में भी कॉमेडी करते थे. इससे सुनने वाले तो हंसते थे. जज साहब भी हंसने लगते थे. यहां तक कि आरोपी भी हंसता था’. और जनाब, तीनों भाईयों की कॉमेडी की ‘ख़ानदानी-ख़ासियत’ से कोई अच्छे से वाबस्त होना चाहे, तो इनकी पिक्चर देख सकता है, ‘चलती का नाम गाड़ी’. साल 1958 में आई थी. किशोर कुमार ही इसे बनाने वालों में थे. पर उन्हें लगा था कि ‘गाड़ी चलेगी नहीं’. मगर चल निकली. ऐसी चली कि अब भी चर्चा है.

इसी तरह, ‘दादा-मुनि’ को किशोर कुमार के बारे में भी शुरू में लगता था कि ‘यह गाने में चलेगा नहीं’. साल 1990 में टेलीविजन धारावाहिक ‘अनमोल रतन’ की शूटिंग के दौरान उन्होंने कुछ ख़ुलासे किए थे, ‘जब वह पैदा हुआ तो गला इतना कर्कश था कि क्या बताऊं. हर वक़्त खांसता रहता था. तभी एक मर्तबा हंसिए से उसकी अंगुली कट गई. उन दिनों दर्द मिटाने की कोई दवा होती नहीं थी. तो वह अंगुली में पट्‌टी बंधी होने के बावजूद दिन में 22-22 घंटे रोता रहता था, दर्द की वज़ह से. लेकिन ख़ास बात ये रही कि इतने दिनों तक लगातार रोने की वज़ह से उसका गला खुल गया’. फिर वे आगे बताते हैं, ‘हां, गाने का शौक़ तो था उसे ज़्यादा. बचपन से ही. केएल सहगल साहब की नक़लें किया करता था. मेरी फिल्मों के गाने भी गाता था. पर गाने की उसकी कोई ता’लीम नहीं थी. उस दौर में मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, मन्ना डे, जैसे एक से एक गायक थे. इसीलिए मुझे शक़ था कि उनके बीच वह टिकेगा कैसे?’.

बक़ौल ‘दादा मुनि’, ‘इसीलिए मैंने उसे पहले अदाकारी के लिए फिल्मों में आगे बढ़ाया. वह हुनर ब-ख़ूबी दिख रहा था उसमें. मुझे लगता था कि अगर वह एक्टिंग में आगे जाए, उसे ठीक तरह से ले, तो काफ़ी अच्छा करेगा उसमें. तो मैंने उससे कहा कि एक शॉट लेता हूं तेरा. ‘जिद्दी’ (1948 की फिल्म) में एक शॉट लेता हूं. वो देवानंद आ रहा है. गाना चल रहा है. उसके बीच में ये बोल देना- क्या साहब, ये लड़की के पीछे, नौकरानी के पीछे निकलता है. ज़्यादा नहीं तो बस मुंह हिला देना. एक्सप्रेशन दे देना. लेकिन उसने तो उस शॉट में धीरे से बुदबुदाकर गाली दे दी! मैं देख रहा था. मैं समझ गया कि उसने गाली दी है. मैंने उसे डांटा वहीं- ये क्या बोल रहा है तू. पर उसे कहां कोई फ़र्क पड़ने वाला’. अब जनाब, इससे आगे किशोर कुमार की सुनिए, ‘मैं तो दादा मुनि के पास ये ख़्वाहिश लेकर बंबई आया था कि वे मुझे मेरे गुरु सहगल साहब से मिलवा देंगे. एक्टिंग-वैक्टिंग करने का तो सोचा भी नहीं था कभी’.

जाने-माने पत्रकार प्रीतिश नंदी और एक बार लता मंगेशकर से भी, बातचीत के दौरान किशोर-दा ने बताया था, ‘मैं तो एक्टिंग से पीछा छुड़ा रहा था. इसीलिए जब भी मुझे दादा मुनि या उनके कोई जानने वाले फिल्मों में एक्टिंग करने के लिए कहते तो मैं ऊल-जलूल हरक़तें करता था. कभी फिल्म के सैट पर सिर मुंडवा कर पहुंच जाता. कभी दुख भरे सीन के बीच यूडलिंग करने लगता. डायलॉग भी इधर-उधर कर देता. एक बार तो जो मुझे बीना रॉय से दूसरी फिल्म में कहना था, उसे मैंने किसी और में मीना कुमारी के सामने बोल दिया. पर वे (फिल्म वाले) मुझे छोड़ने को तैयार ही न हुए. क्योंकि मेरी ऐसी हरक़तें भी दर्शकों को पसंद आ गईं. वह नैचुरल एक्टिंग लगी. मुझे दिलीप कुमार के बाद अदाकारी में एक और बड़ी ख़ोज मान लिया गया. और मुझे एक्टिंग के लिए फिल्में मिलती रहीं लगातार. फिर भी मेरा मन नहीं लगा एक्टिंग में. एक्टिंग तो नकली होती है न. सुर सच्चे होते हैं. सो, उन्हीं से नाता निभाया’.

और दिलचस्प बात है जनाब, कि ख़ुद अशोक कुमार को भी शुरू में लगता था कि उनसे एक्टिंग नहीं हो पाएगी. हां, मौका मिले तो वे डायरेक्शन में ज़रूर हाथ आज़मा सकते हैं. थाेड़ा-बहुत गा भी सकते हैं. ख़ुद उन्हीं से, ‘साल 1935 की बात है. उन दिनों मैं प्रेसिडेंसी कॉलेज (कलकत्ता) में कानून की पढ़ाई कर रहा था. रात में कक्षाएं होती थीं. दिन में कोई काम नहीं होता, तो तस्वीरें देखते थे. उनमें दो-तीन तस्वीरें मुझे बहुत पसंद आईं. इनमें एक थे- देबकी बोस. बहुत बड़े डायरेक्टर होते थे. वे तस्वीरें देखकर मुझे मालूम हुआ कि मैं लॉ क्यों पढ़ूं. क्यों न डायरेक्टर बन जाएं. उस वक़्त हिमांशु रॉय (बॉम्बे टॉकीज़ के मालिक) जर्मनी से लौटे थे. पूरे जर्मन लोगों को लेकर. वे यहां (बंबई में) कुछ स्टूडियो खोलना चाहते थे. तब मैंने सोचा कि क्यों न उनसे अपॉइंटमेंट लूं. उनके पास जाकर बनने लायक कुछ सीखूं. उस वक़्त मेरे बहनोई एस (शशधर) मुखर्जी यहां फेमस (स्टूडियो) में साउंड इंजीनियर थे’.

‘मैंने मुखर्जी साहब को चिट्‌ठी लिखी कि भई, हम उनसे (हिमांशु रॉय से) मिलना चाहते हैं. अपॉइंटमेंट फिक्स कराओ. तो उन्होंने कहा कि सीधे चले आओ. मिलने चलेंगे. फिर देखते हैं. मेरे पास 35 रुपए थे, एक्ज़ामिनेशन फीस देने के लिए. तो मैंने सोचा कि एक्ज़ामिनेशन बाद में कर लेंगे और 33 रुपए देकर थर्ड क्लास का टिकट लिया और सीधे बंबई चला आया. हिमांशु रॉय से मिला. उनके साथ जर्मन डायरेक्टर फ्रैंज ऑस्टन भी थे. तब हिमांशु रॉय बोले- मैं चाहता हूं कि सिर्फ़ पढ़े लिखे लोग ही फिल्मों में आएं. वहीं, ऑस्टिन ने मेरा स्क्रीन टेस्ट लेने की बात कही. उस वक़्त स्टूडियो बना नहीं था. एक मकान था. वहां सीढ़ी के ऊपर बिठा दिया और मुझसे कहा- गाना गाओ’. यहां याद दिला दें जनाब, कि इस दौर में अदाकार को ही फिल्म में अपने गाने भी ख़ुद गाने पड़ते थे. तो आगे ब-क़ौल दादा मुनि, ‘मैं बहुत सोचकर एक गाना गाया. ऑस्टिन उसे सुनकर बोले- मिस्टर हिमांशु दिस ब्वॉय विल नॉट बि एबल टु डू’.

‘मैं सुन रहा था. वे मेरे पास आए. पूछा- व्हाट आर यू डूइंग. मैंने कहा- आई एम स्टडीइंग लॉ इन कैलकटा. तो वे बोले- गो बैक टु कैलकटा एंड स्टडी लॉ. लेकिन तभी हिमांशु रॉय ने मुझे बुलाया और बोले- तुम एक काम करो, लैबोरेटरी में लग जाओ. लैबोरेटरी में तुम्हें प्रिंट करना है, फिल्म धोना है और एडिटिंग करना है. मैंने कहा- ठीक है. वो कर लूंगा. एक्टिंग तो नहीं करनी पड़ेगी. तभी ‘जीवन नैया’ (1936 की फिल्म) शुरू हुई. नज्म-उल-हसन उसमें एक्टर थे. उन्होंने बीच में फिल्म छोड़ दी. तो हिमांशु रॉय मेरे पास आए. कहने लगे- तुम तैयार हो जाओ. मैं चाहता हूं, तुम फिल्म में एक्टिंग करो. मैंने कहा- नहीं, नहीं. मेरे से होगा नहीं. और मेरे मां-बाप भी नहीं चाहते कि मैं एक्टिंग करूं. तो वे बोले- एक काम करो. एक पिक्चर करो. इसके बाद हम तुम्हें छोड़ देंगे. तो वो ‘जीवन नैया’ शुरू हुई. उसके बाद ‘अछूत कन्या’ (1936 की फिल्म). वह भी चल पड़ी’. यूं जनाब, दादा मुनि की एक्टिंग की गाड़ी भी चल पड़ी.

अब रही बात किशोर-दा के गाने की तो यूं उन्हें सबसे पहली बार फिल्मों में संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने गवाया था. उसी ‘ज़िद्दी’ फिल्म में, जिसमें दादा-मुनि उनसे एक्टिंग कराने की कोशिश कर रहे थे. इस फिल्म में देवानंद साहब के लिए किशोर दा ने गाया था, ‘मरने की दुआएं क्यूं मागूं, जीने की तमन्ना कौन करे’. हालांकि, इसमें किशोर-दा की आवाज़ में उनके गुरु सहगल साहब की छाया नज़र आती है. मगर, किशोर कुमार के गले में किशोर-दा की ही आवाज़ को भी ढूंढ लिया गया आख़िर. और यह कमाल किया, मूसीक़ार सचिन देब बर्मन साहब ने. ये बात है 1950 के आस-पास की. उस वक़्त ‘मशाल’ फिल्म बन रही थी. उसमें एसडी बर्मन संगीत दे रहे थे. उसी दौरान वे एक दफ़ा दादा-मुनि के घर गए. तब किशोर-दा ग़ुसलख़ाने में नहाते वक़्त सहगल साहब की नकल करते हुए गा रहे थे. बीच में, अपनी ख़ास यूडलिंग भी उसमें डाल देते. उनका यह तरीका एसडी बर्मन साहब को जंच गया.

बताते हैं, उस वक़्त  बर्मन साहब ने किशोर-दा से कहा, ‘किशोर, गाना तो तुम अच्छा गाते हो. लेकिन यह और अच्छा हो जाएगा अगर तुम अपनी आवाज़ में गाओ. अपने तरीके से’. किशोर-दा ने बर्मन साहब का यह मशवरा हाथों-हाथ लिया और  इसके आगे जो हुआ, वह तो तारीख़ में दर्ज़ है ही. सो, अब चलते-चलते यह भी बता देना काम का बन पड़ेगा कि जैसा ‘दादा मुनि’ ख़ुद बताते हैं, ‘मैंने क़रीब 300 फिल्में की हैं. इनमें 50 के क़रीब हिट-सुपरहिट रहीं’. वहीं, किशोर-दा के बारे में एक अंदाज़ा है कि उन्होंने 1940 से 1980 के बीच अपने करियर में 574 के आस-पास गाने गाए. यक़ीनन सुनने वालों को उनके कुछ और गाने सुनकर सुकून मिलता अगर वे वक़्त से पहले दुनिया न छोड़ गए होते. और तब ये भी मुमकिन होता शायद कि ‘दादा मुनि’ के जन्मदिन पर भी कोई दाग़ न आ ठहरता. पर वो कहते हैं न, ऊपर वाले ने माथे पर जाे लिख भेजा है, उसे कब, कौन बदल सका है भला!

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