दास्तान-गो: अर्देशिर ईरानी से सुनिए, हिन्दुस्तान में पहली फिल्म को आवाज़ कैसे मिली?

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, पहले किस्सा सुनिए. ‘आलम-आरा पिक्चर बनाने के करीब एक-सवा साल पहले की बात है. मै कुछ दोस्तों के साथ एक्सलसियर थिएटर में फिल्म देखने गया था. वहां ‘शो बोट’ लगी थी. अमेरिकी फिल्मकार हैरी ए पोलार्ड ने इसे बनाया था. रोमांटिक ड्रामा है और क़रीब 40 फ़ीसद बोलती हुई. वहीं, उस फिल्म को देखकर मेरे दिमाग़ में ख़्याल आया कि क्यूं न हम हिन्दुस्तान में 100 फ़ीसद बोलती फिल्म बनाने का तज्रबा करें. हालांकि, हम में से यहां किसी को इस बारे में कुछ पता नहीं था कि यह सब कैसे होगा. फिर भी, हमने आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. उस वक़्त बंबई में एक नाटककार होते थे जोसेफ़ डेविड. वे ‘आलम-आरा’ नाम का नाटक खेला करते थे. उसी नाटक की कहानी लेकर हमने हिन्दुस्तान की यह पहली बोलती फिल्म बनाई. मुश्किलें तमाम थीं, पर एक बार तय कर लिया कि करना है, तो फिर पीछे नहीं हटे’.

‘कहानी मुकम्मल हुई तो इसकी पटकथा मैंने ख़ुद लिखी. हिन्दी, उर्दू में डायलॉग लिखे गए. इसके बाद अदाकारों को चुना जाना था. तो उसमें हीरोइन के तौर पर मैं रूबी मायर्स को लेना चाहता था, जिसे लोग सुलोचना के नाम से जानते हैं. पर वह हिन्दी, उर्दू ठीक से बोल नहीं पाती थी. इसलिए ज़ुबैदा को लिया. इससे रूबी को बहुत बुरा लगा. उसने अगले एक साल तो फिल्मों में एक्टिंग ही नहीं की. हिन्दी, उर्दू बोलना सीखा पहले. पृथ्वीराज (कपूर) को विलेन बनाया इसमें. और हीरो के लिए मेरी पसंद महबूब खान था. वही, जो मशहूर प्रोड्यूसर, डायरेक्टर हुआ. मगर जानने वालों ने मुझे कहा कि एक तो ‘नए क़िस्म का तज्रबा. बोलती फिल्म का. ऊपर से हीरो नया. कितना जोखिम लोगे भाई?’. तब मुझे भी लगा कि हां, बात तो कुछ हद तक सही है. लिहाज़ा, मास्टर विट्‌ठल को लिया. हीरो के लिए. अबोली फिल्मों का जाना-पहचाना नाम’.

‘हालांकि मास्टर विट्‌ठल को भी इधर हमारे साथ आने में कोई आसानी नहीं हुई. वह इससे पहले सारधी स्टूडियो के साथ कॉन्ट्रेक्ट में था. पहले ऐसा ही होता था. तमाम फ़नकार किसी न किसी स्टूडियो या फिल्म कंपनी के साथ कॉन्ट्रेक्ट में रहते थे. वहां से उन्हें तनख़्वाह की शक्ल में मेहनताना मिलता था. एक-एक फिल्म के हिसाब से भुगतान नहीं होता था. तो, सारधी स्टूडियो वालों ने मास्टर विट्‌ठल पर मुक़दमा ठोक दिया कि उसने कॉन्ट्रेक्ट तोड़ा है. अलबत्ता, अदालत में उसकी तरफ़ से मशहूर वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने ऐसी दलीलें दीं कि फ़ैसला उसके हक़ में ही आया. तो, इस तरह मास्टर विट्‌ठल हमारे साथ आया. फिर, बात आई कि फिल्म की शूटिंग के लिए कैमरे वग़ैरा कहां से आएं. साथ ही, शूटिंग कहां हो, यह भी मसला था. तब, साउंडप्रूफ़ स्टूडियो तो होते नहीं थे. पर कम से कम ठीक-ठाक स्टूडियो तो मिल जाए’.

‘तो, इस सब में हमें कैमरे और दूसरा साज़-ओ-सामान अमेरिका से मंगवाना पड़ा. जबकि लोकेशन के लिए हमारी तलाश पूरी हुई ज्योति स्टूडियो पर. मगर वहां एक बड़ी दिक़्क़त थी. वह स्टूडियो रेलवे ट्रैक के बगल में था. वहां से हर मिनट कोई न कोई ट्रेन गुजरा करती. यह एक नई मुसीबत आन पड़ी. इसका तोड़ हमने यूं निकाला कि ज़्यादातर शूटिंग रात के वक़्त की. यही कोई एक बजे शूटिंग शुरू होती. तड़के चार बजे तक काम निपटा दिया जाता. इस वक़्त तक रेलवे ट्रैक क़रीब-क़रीब सुनसान रहता था. एक ही कैमरा होता था. उसी से फिल्म शूट हुई. नाटक की तरह. उसमें आवाज़ के लिए माइक्रोफोन को स्टेज के आस-पास इस तरह रखना पड़ता था कि वह कैमरे की ज़द से दूर रहे. रिकॉर्डिंग में नज़र न आए. आदि एम. ईरानी ने कैमरे के पीछे की शीट संभाली. मैंने और मेरे साथ रुस्तम भरूचा ने साउंड रिकॉर्डिंग का काम देखा’.

‘जब अमेरिकी एक्सपर्ट विल्फर्ड डेमिंग हमारे लिए साउंड रिकॉर्डिंग मशीन असेंबल करने जब बंबई आए, तभी मैंने और भरूचा ने उनसे थोड़ा यह काम सीख लिया था. उन्होंने इसके लिए 100 रुपए फीस ली थी. वह हमारे लिए बड़ी रकम थी. इसलिए ज़्यादा नहीं सीखा. उनकी आगे सेवाएं भी नहीं लीं. ख़ुद किया यह काम. मगर मुश्किल बहुत होती थी. क्योंकि जब शूटिंग हो रही होती, उसी वक्त साउंड रिकॉर्डिंग भी करनी पड़ती. इस तकनीक को ‘तनार’ कहते हैं. इसमें बहुत वक़्त ज़ाया हुआ. एक बार में सही रिकॉर्डिंग हो ही नहीं पाती थी. इस चक्कर में हमें यह पिक्चर बनाने में क़रीब चार महीने का वक़्त लग गया. जबकि अबोली फिल्म पूरी करने में हमें ज़्यादा से ज़्यादा एक महीना लगता था. खै़र, इस फिल्म में हमने गाने भी डाले थे. पर कोई मूसीक़ार यानी कि संगीत-निर्देशन करने वाला हमारे साथ नहीं था’.

‘स्टेज के पास ही पर्दे के पीछे हारमोनियम और तबले वाले को बिठाया हुआ था. और जो माइक छिपाकर रखा था वहीं कहीं, उस पर गाने वाला अपनी आवाज़ देता था. और कमाल की बात रही कि इस फिल्म के पूरे गाने हिट हो गए. ख़ास तौर पर एक तो ज़बर्दस्त ही हिट हुआ, ‘दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे’. इससे जुड़ा वाक़ि’आ दिलचस्प है. इस नग़्मे को मोहम्मद वज़ीर खान ने आवाज़ दी है. उसे हिन्दी फिल्मों का पहला गवैया कहिए. उससे हमने फिल्म में फ़कीर का किरदार भी कराया है. पर जानते हैं, वह अस्ल में था कौन? चौकीदार था वह. बुलंद आवाज़ थी उसकी. इसीलिए उसे फ़कीर के किरदार में लिया. पर, बाकी ज़्यादातर गाने ज़ुबैदा ने गाए थे. अच्छा गाती थी. उसके गाने भी खूब चले. फिल्म भी ज़बर्दस्त चली. मार्च की 14 तारीख़ को, साल 1931 में जब यह पिक्चर आई तो हफ़्तों तक इसके टिकट ही नहीं मिल पाए लोगों को’.

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‘और हां, एक बात बताना तो भूल ही गया. हमारे बंबई में तब एक बड़े कारोबारी हुआ करते थे. सेठ भगवान दास दुबे. उनसे हमने इस पिक्चर के लिए 40,000 रुपए लिए थे. अलबत्ता, जब तक हमने पूरी पिक्चर बना नहीं ली, तब तक चुनिंदा लोगों के अलावा किसी को भनक नहीं लगने दी कि हम बोलती फिल्म बना रहे हैं. पहला तज्रबा था, इसलिए एहतियात ज़रूरी थी’.

तो जनाब, ये थी हिन्दुस्तान की पहली बोलती फिल्म ‘आलम-आरा’ की कहानी. और इसे सुनाया ख़ुद उस शख़्सियत ने, जिसने यह कारनामा अंज़ाम दिया था. यानी अर्देशिर ईरानी, जिनका आज 14 अक्टूबर के ही रोज इंतिक़ाल हुआ था, साल 1969 में. ईरानी साहब फिल्मों की कहानियां लिखते थे. उन्हें बनाते और उनका निर्देशन भी करते थे. हिन्दी, उर्दू, तमिल, तेलुगु, इंग्लिश, जर्मन, पर्सियन, इंडोनेशियन जैसे ज़बानों में फिल्में बनाई इन्होंने. अबोली फिल्मों में तो कैमरा भी संभाला. यह काम अंग्रेजी ज़बान में सिनेमैटोग्राफी कहलाता है. यही नहीं, पहली बोलती फिल्म की तरह उन्होंने आगे एक और तज्रबा किया, रंगीन पिक्चर बनाने का. उनकी ‘किसान कन्या’ (1937) हिन्दुस्तान की पहली रंगीन फिल्म कहलाती है. यानी, ईरानी साहब ही थे, जिन्होंने फिल्मों को ज़ुबान देने के साथ उनमें रंग भरने की भी शुरुआत की थी.

इस लिहाज़ से देखें तो ‘हिन्दुस्तानी सिनेमा के पितामह’ कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के के बाद बस, अगले पायदान पर ही खड़े नज़र आते हैं ईरानी साहब. और फिल्मों में ही नहीं, ईरानी साहब अपने दौर के कामयाब कारोबारी भी होते थे. उनकी अपनी फिल्म कंपनी थी, ‘इंपीरियल फिल्म्स’. ग्रामोफोन एजेंसी थी. इसके अलावा एक कार एजेंसी के भी वह मालिक थे. उन्होंने एक मर्तबा डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने वाले भगवान दास गर्ग को इंटरव्यू दिया था. उसमें तफ़सील से तमाम बातें की थीं. तभी यह भी बताया था कि ‘आलम-आरा’ कैसे बनी. उसकी राह में कैसी दिक़्क़ते आईं. क्या-क्या हुआ, वग़ैरा. उनका यह इंटरव्यू गर्ग साहब के नाम से बनी एक वेबसाइट पर 1980 से ही चस्पा है. वहीं से और वहां के अलावा कुछ इसी तरह की दूसरी भरोसेमंद जगहों पर मौज़ूद जानकारियों की मदद से, आज की इस दास्तान का ताना-बाना बना है. ख़ास तौर पर फिल्मों के शौक़ीनों के लिए. और उनके लिए भी, जो तारीख़ी वाक़ि’आत, किरदार वग़ैरा में दिलचस्पी रखते हैं.

Tags: Death anniversary special, Hindi news, News18 Hindi Originals

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