क्या है इंटरपोल, जिसकी महासभा में भारत में 25 साल बाद हो रही

हाइलाइट्स

कितना ताकतवर होता है इंटरपोल और कैसे काम करता है
भारत क्यों अक्सर मांगता है इंटरपोल से मदद, कितने देश इसके सदस्य
इंटरपोल तकनीकी तौर पर काफी संपन्न ताकि अपराधी पकड़ से बचे

भारत की राजधानी नई दिल्ली में 25 सालों के अंतराल के बाद इंटरपोल की महासभा हो रही है. ये इसकी 90वीं महासभा है. पूरी दुनिया से पुलिस से जुड़े अधिकारी, नेता सभी इसमें शामिल हो रहे हैं. आमतौर पर ये इंटरनेशनल पुलिस की तरह काम करती है. ये तमाम देशों के साथ तालमेल करके काम करती है लेकिन इसकी अपनी संस्था में भी हर देश के लोग काम करते हैं.

इंटरपोल का मुख्यालय फ्रांस के लियोन में है. 195 देश के इसके सदस्य हैं इसमें करीब 191 देशों के 1050 कर्मचारी हैं. सालाना बजट फिलहाल 142 मिलियन यूरो यानि 1149 करोड़ रुपए का है. हर साल जो इसकी सालाना आमसभा होती है, उसमें आगे की रणनीति, बजट, सोर्स, फैसलों, बदलाव, सहयोग और काम के तरीकों के साथ गतिविधियों पर विचार होता है और इस पर अंतिम मुहर लगाई जाती है.

इंटरपोल के 07 क्षेत्रीय कार्यालय हैं. इसकी एक्जीक्यूटिव एसेंबली में 19 सदस्य होते हैं. जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और डेलिगेट्स शामिल होते हैं. फिलहाल जर्मनी के जुर्गेन स्टाक इसके महासचिव हैं, जो लियोन में बैठकर इसके कामों को अंजाम देते हैं और समय समय पर जरूरी फैसले लेते हैं.

जिस तरह दुनिया और तकनीक बदली है, उसी के हिसाब से इंटरपोल का काम भी बदला है. इसके कामों में सीमा से लेकर तस्करी, फ्राड. डिजिटल अपराध बहुत सी चीजें इसके काम में शामिल हैं, जो ये सदस्य देशों के साथ सहयोग लेकर करता है.

इंटरपोल का झंडा, इसका पलड़ा बताता है कि जब ये काम करता है तो किसी तरह के पक्षपात से रहित रहकर इसको करता है और तलवार बताती है कि अपराधियों से निपटने में ये सक्षम है. ये झंडा हल्के नीले या आसमानी रंग है. (फोटो विकी कामंस)

हालांकि कभी कभी इसके पास ऐसे अनुरोध भी आते हैं, जिसे करना इसके लिए असंभव सा ही होता है. जैसे करीब दो साल पहले जब ईरान के सैन्य जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या हुई तो ईरान ने इसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया और उसने अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी करने के बाद इंटरपोल से मदद मांगी. हालांकि इंटरपोल की भी अपनी सीमाएं हैं, वो इसमें कुछ कर नहीं सकता था.

इंटरपोल आमतौर पर टॉप लेवल पर बैठे लोगों के लिए रेड नोटिस निकालता है ताकि अरेस्ट की प्रक्रिया आसान हो सके. भारत में भी सीबीआई ने कुछ ही समय पहले नीरव मोदी, मेहुल चोक्सी और विजय माल्या को आर्थिक घपलों के आरोप में देश लौटाने के लिए इंटरपोल की मदद मांगी थी.

क्या है इंटरपोल

इसका पूरा नाम इंटरनेशनल क्रिमिनल पुलिस ऑर्गेनाइजेशन है. 192 देश इसके सदस्य हैं, जिनमें से एक भारत भी है. साल 1923 में इस संगठन की स्थापना हुई थी, जिसका हेडक्वार्टर फ्रांस के लिऑन में तैयार हुआ. इसका मकसद है दुनियाभर की पुलिस इकट्ठे काम करे ताकि खूंखार और ऊंची पहुंच वाले अपराधियों को पकड़ा जा सके और दुनिया सुरक्षित रहे. मॉर्डन समय में चूंकि क्रिमिनल्स भी तकनीकों का सहारा लेकर काम करते हैं तो इंटरपोल भी तकनीकी तौर पर काफी संपन्न है ताकि अपराधी उसकी पकड़ से बच न सकें.

इंटरपोल में एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग, जिसमें 19 सदस्य होते हैं. (सौजन्य – इंटरपोल)

भारत कब से इसका सदस्य है?

भारत साल 1956 से इसका सदस्य है. दूसरे सारे सदस्यों की तरह हमारे यहां भी नेशनल सेंट्रल ब्यूरो (NCB) है. ये एक तरह से भारत की कानूनी संस्थाओं और पुलिस को इंटरनेशनल लेवल पर इंटरपोल से जोड़ता है. इसमें कई लोग होते हैं जो इंटरपोल से सीधे संपर्क में होते हैं. हमें बहुतों बार इंटरपोल की मदद की जरूरत होती है, खासकर इंटरनेशनल लेवल पर तस्करी के मामलों में, बड़े स्तर के आर्थिक घपलों में, जब आरोपी देश छोड़कर भाग जाता है. ड्रग्स और नकली दवाओं के रैकेट के मामले में भी भारत कई बार इंटरपोल से मदद ले चुका है.

इंटरपोल क्या और कैसे करता है?

अपराधी के टॉप स्तर पर बचने की कोशिश का पता चलते ही इंटरपोल सक्रिय हो जाता है. ये तुरंत काम शुरू करता है. इसके तहत सूचनाओं का लेन-देन होता है और रिसर्च होती है कि कोई व्यक्ति या संगठन किस तरह से क्राइम को अंजाम दे रहा है और कैसे उसे खत्म किया जा सकता है. काफी खुफिया स्तर पर काम होता है जिसमें कोड लैंग्वेज का इस्तेमाल होता है. इसमें कलर कोड की भी काफी अहमियत होती है. इसी के तहत चार तरह के नोटिस इंटरपोल जारी करता है, जो इसकी सबसे बड़ी ताकत है.

इसमें इंग्लिश, स्पेनिश, फ्रेंच और अरेबिक में काम होता है. वैसे इंटरपोल के पास अरेस्ट की ताकत नहीं होती. अगर कोई सदस्य देश इस तरह की रिक्वेस्ट करता है तो इंटरपोल उस संदेश को दूसरे देशों को भेजता है. वहां से जो संदेश मिलते हैं, वो उस देश तक पहुंचाए जाते हैं, जिसने रिक्वेस्ट की है.

इंटरपोल की स्थापना 1923 में हुई तो इसकी पहली जनरल असेंबली बर्लिंन में 1924 में हुई, उसी मौके का चित्र . (सौजन्य – इंटरपोल)

किस तरह के नोटिस जारी करता है इंटरपोल?

रेड नोटिस- इसके तहत आरोपी/दोषी को किसी खास देश के अनुरोध पर उस देश से सौंपने की रिक्वेस्ट करना है, जहां वो है. इसके लिए पक्का नेशनल अरेस्ट वारंट चाहिए होता है तभी इंटरपोल ऐसी रिक्वेस्ट कर पाता है. हालांकि, भगोड़े की गिरफ्तारी उस सदस्य राष्ट्र के शासन पर आधारित होती है, जहां वह है.

यलो नोटिस- लापता लोगों का पता लगाने में मदद करने के लिए यलो नोटिस जारी किया जाता है. ये अक्सर नाबालिकों या ऐसे लोगों के लिए जारी होता है जो खुद अपनी पहचान में असमर्थ होते हैं, जैसे मानसिक तौर पर दिव्यांग लोग. मानव तस्करी का रैकेट बड़े स्तर पर काम करता है. तब इंटरपोल इसे पहचानने में काफी काम आता है. इसी तरह से किसी प्राकृतिक आपदा के दौरान काफी लोग लापता हो जाते हैं. तब भी उनका पता लगाने के लिए इंटरपोल मदद करता है.

ब्लू नोटिस- किसी अपराध के संबंध में किसी खास की पहचान, स्थान या गतिविधियों के बारे में अतिरिक्त जानकारी जमा करने के लिए ब्लू नोटिस जारी किया जाता है. हालांकि यह व्यक्ति के प्रत्यर्पण या गिरफ्तारी की गारंटी नहीं देता है.

इसी तरह से ब्लैक, ग्रीन, ऑरेंड और पर्पल नोटिस भी होते हैं. सबके अलग-अलग मकसद हैं. ऑरेंज नोटिस भी काफी महत्वपूर्ण है. इसके तहत इंटरपोल किसी ऐसी घटना के बारे में अलर्ट जारी करता है, जिस दौरान काफी बड़ी साजिश का डर हो. जैसे किसी उत्सव के दौरान बम ब्लास्ट की प्लानिंग या कोई और आतंकी गतिविधि का सुराग मिलना.

क्यों इंटरपोल की जरूरत महसूस हुई

इंटरपोल की जरूरत पहले विश्व युद्ध के बाद महसूस हुई जबकि यूरोप में अपराधी काफी बढ़ गए थे. ये एक देश में मनमानी करते और फिर दूसरे देश में जाकर छिप जाते. ऐसे अपराधियों को पकड़ने के लिए 1923 में आस्ट्रिया की राजधानी वियना में वहां के पुलिस अध्यक्ष जोहान्न स्कोबर ने अपनी सरकार की अनुमति से कई देशों के पुलिस अधिकारियों की मीटिंग बुलाई. फिर 20 देशों ने साथ मिलकर इंटरपोल की स्थापना की. . इसका पहला मुख्यालय वियना में बना और स्कोबर इसके मुखिया बने.

फिर दूसरे विश्व युद्ध के समय इसका काम रुक कैसे गया

जब 1938 में जर्मनी नेआस्ट्रिया पर हमला किया तो एक तरह से इंटरपोल भी खत्म हो गया. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इंटरपोल करीब करीब ठप ही रहा. इसके बाद बेल्जियम पुलिस के इंस्पेक्टर जनरल फ्लोरेंट लुवागे ने इसे जिंदा किया. बेल्जियम में सुविधाओं की कमी के कारण वहां इसका मुख्यालय नहीं बन सका. इसे फिर पेरिस में बनाया गया. 1955 में करीब 55 देश इसके सदस्य थे.

Tags: Interpol, Police

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